Group Gay Sex Kahani – चिकने लौंडे की कुंवारी गांड में दो लौड़े


ग्रुप गे सेक्स कहानी में पढ़ें कि कैसे मेरे पापा के दोस्त के 2 बेटों ने मेरे चिकने गोरे बदन को देख कर मुझे समलैंगिक सेक्स की तरफ धकेल दिया. हालांकि इसमें मैंने भी मजा लिया.

दोस्तो, मैं सूर्य प्रताप एक बार फिर से आपकी सेवा में अपनी गांड चुदाई की कहानी लेकर हाजिर हूँ.
कहानी के पहले भाग
हट्टा कट्टा चिकना गांडू
में अब तक आपने पढ़ा था कि रमेश और सुरेश भैया दोनों ही मेरी गांड मारने की फिराक में थे और मुझे भी अपनी गांड की खुजली दूर करवाने को जी कर रहा था.
अपने बदन में लगी आग को बुझवाने के लिए मैंने तुरंत हां में सर हिल दिया.

अब आगे ग्रुप गे सेक्स कहानी:

मेरा इशारा पाते ही रमेश भैया ने मुझे बांहों में भर लिया और मेरे होंठों पर अपने गर्म मोटे होंठ रख दिए.
वे मुझे बेतहाशा चूमने लगे.

उस समय मेरी हाइट उनसे काफी कम थी तो शुरू में तो वे झुक कर मुझे किस कर रहे थे.

बाद में उन्होंने किसी बच्चे की तरह मुझे गोदी में ऊंचा उठाया और मुझे अपने बराबर लाकर मेरे होंठों को अपने दांतों से चबाने से लगे.
जो भी था, मेरे शरीर से वह अनजानी सी गर्मी वाली फीलिंग कम सी हो रही थी, मुझे बहुत सुकून सा मिल रहा था.

मैंने भी उनको बांहों में भर लिया था और अब मैं उनकी मजबूत पीठ पर अपने मुलायम हाथ फिरा रहा था.

फिर उन्होंने पूछा- अब कैसा लग रहा है?
मैंने हड़बड़ाते हुए कहा- रुक क्यों गए. बहुत अच्छा लग रहा था.

‘तुझे और अच्छा फील करवाने के लिए ही रुका हूँ.’ कहते हुए उन्होंने मुझे गोदी में उठाए हुए ही उल्टा कर दिया.
यानि मेरा सर फर्श की ओर था और मेरे पैर बाथरूम की छत की ओर.
फिर उन्होंने मुझे और ऊंचा किया, कुछ इस तरह कि मेरी जांघें अब उनके मजबूत कन्धों पर टिकी हुई थीं.

उनका लौड़ा मेरी आंखों के सामने तनतना कर झटके मार रहा था.
गुलाब जामुन जैसे काले काले मोटे मोटे उनके दोनों आंड शरीर के मूवमेंट के साथ आगे पीछे झूल रहे थे.

फिर अचानक मुझे लगा कि मेरे लौड़े और मेरे आंडों को किसी ने किसी गर्म भट्टी में झोंक दिया हो.
पर ये वो वाली गर्मी नहीं थी.
मुझे मेरे लौड़े पर कुछ गर्म गर्म गीला गीला सा महसूस हुआ, कुछ सरसराहारट सी महसूस हुई.

तब समझ आया कि रमेश भैया ने मेरे लौड़े और मेरे आंडों को एक साथ अपने मुँह में ले रखा था … और मुँह के अन्दर ही, वह अपनी गर्म जुबान से मेरे लौड़े पर सरसराहट पैदा कर रहे थे.

वह सनसनी अलग ही थी.
मेरी आंखें, नशे में धुत्त किसी शराबी की तरह मुंद सी गयी थीं.
मेरे मुँह से ‘आह आह.’ निकलने लगी थी.

इस पर भी ना तो भैया ने मेरे लौड़े या मेरे आंडों को अपने मुँह से बाहर निकाला … और ना अपना तमतमाता हुआ झटके मारता लौड़ा, जो उस समय मेरे चेहरे से कुछ सेंटीमीटर ही दूरी पर था, मेरे मुँह में दिया.

भैया इतनी तन्मयता से मेरा लौड़ा पी रहे थे कि हिचकिचाते हुए ही सही, मैंने भी उनके लौड़े को अपने होंठों से लगा लिया.

इससे भैया के मुँह से एक सिसकारी सी निकल गयी.
उन्होंने हल्का सा धक्का देकर अपने लौड़े के शुरूआती कुछ इंच मेरे गुलाबी होंठों के अन्दर कर दिए.

मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे मुँह में कोई मोटी सी गाजर या पतली लौकी ठूंस दी हो.

मेरे दांत उनके लौड़े पर रगड़ रहे थे पर शायद उनको कोई फर्क नहीं पड़ रहा था.

वह उसी तरह गप गप करके मेरे लौड़े मेरे आंडों को खाये जा रहे थे और मेरे मुँह में अपना लौड़ा अन्दर बाहर किए जा रहे थे.

हालांकि मैं मुश्किल से उनके लौड़े के शुरूआती 4-5 इंच ही अपने मुँह में ले पा रहा था पर उनको अपने आधे लौड़े पर मेरी कोमल जुबान की फील इतनी अच्छी लग रही थी कि वह अपने लौड़े पर मेरे दांतों की रगड़ को भी बर्दाश्त कर रहे थे.

इस तरह हवा में उल्टा लटके हुए ही मैंने रमेश भैया का लौड़ा अपने मुँह में लिए लिया, उनके मुँह में अपने लौड़े आंड को दे दिए.
फिर कब हम लोगों ने जगह चेंज कर ली, पता ही नहीं चला.

अब मेरी पीठ बाथरूम के दरवाजे की ओर थी और भैया की पीठ शॉवर की ओर.
तभी लगा कि मेरी पीठ को अब 2 नहीं 4 हाथ सहला रहे हैं.

सुरेश भैया भी बाथरूम में आ गए थे.
अब मैं उल्टा लटका हुआ, रमेश भैया और सुरेश भैया के बीच में सैंडविच बना हुआ था.

सुरेश भैया, मेरे नंगे गुलाबी चूतड़ों को अपनी बड़ी सी जीभ को पूरा बाहर निकाल कर सपड़ सपड़ करके चाट रहे थे.

वे एक ही स्ट्रोक में मेरे चूतड़ को कमर से जांघ तक चाट जा रहे थे, कभी लेफ्ट वाला, कभी राइट वाला.
उनके हाथ कभी मेरे चूतड़ों को मसल रहे थे और कभी मेरे और रमेश भैया के बदन के बीच जाकर मेरे निप्पलों को मसल रहे थे.

फिर उन्होंने मेरे चूतड़ों को खरबूजे की फांक की तरह फाड़ा और फड़फड़ाती हुई मेरी गांड के कुलबुलाते हुए छेद पर अपनी लम्बी मोटी सी जुबान का गीला फुल लेंथ स्ट्रोक मारा.
ये शायद उनके अगले एक्शन की तैयारी थी.

मेरी गांड के दोनों खरबूजे सुरेश भैया के बड़े बड़े हाथों ने दबोच रखे थे.
कभी वह मेरी गांड के खुलते बंद होते छेद को जीभ के कोने से कुरेदते, कभी मेरी गांड के छेद की चुन्नटों को अपने दांतों से हौले से चबाते, तो कभी अपनी नाक की टिप से उसे सहलाते.

अब तक मेरी गांड का छेद इतने गीला इतना रसीला हो गया था कि सुरेश भैया की जीभ मेरी गांड में काफी अन्दर तक जा पा रही थी.

फिर वह दोनों मुझे ऐसे ही उठाये उठाये बाथरूम से निकल कर मेरे बेडरूम में ले आए और मुझे बेड पर लिटा दिया.

अब थोड़ा सा बदलाव आ गया था.
मैं टांगें उठाए छत को देखता हुआ लेटा हुआ था.

सुरेश भैया मेरे सर के पास मेरे सर के दोनों और घुटने टिकाये ऐसे बैठे थे कि उनका लौड़ा और बड़े बड़े आंड एकदम मेरी नाक पर आ रहे थे.

मेरी टांगें हवा में उठी हुई चौड़ी हो रखी थीं.
टखनों के पास से मेरी टांगों को रमेश भैया ने पकड़ कर फैला रखा था, जिस वजह से सुरेश भैया की लार से लिपटा, गीला हुआ पूरी तरह से खुल कर लपलपाता हुआ मेरी गांड का छेद था.

ये छेद रमेश भैया के 90 डिग्री पर सलामी देते हुए लौड़े की एकदम सीध में आ गया था.

फिर रमेश भैया ने एकदम से हल्का सा खाँसा.
ये शायद कोई सिग्नल था क्योंकि उनके खांसते ही, सुरेश भैया ने अपना लोहे की रॉड जैसा टाइट लौड़ा मेरे मुँह में आधा ठूंस दिया.
मेरी आंखें फट कर चौड़ी हो गईं.

मैं ठीक से सांस भी नहीं ले पा रहा था. मेरे मुँह से आवाज़ नहीं निकल सकती थी.
तभी मुझे लगा कैसे किसी ने मेरी गांड के छेद में जलती हुई लकड़ी घुसेड़ दी.

ये रमेश भैया थे और उन्होंने मेरे ही थूक से लिपटे अपने लौड़े के अगले हिस्से को घप्प से एक ही झटके में मेरी उस गांड में घुसेड़ दिया, जिसे अभी थोड़ी ही देर पहले उनके ही छोटे भाई ने अपने गर्मा गर्म थूक से गीला और ढीला किया था.

दर्द तो नहीं, पर एक अलग से चुभन सी फील हुई थी, जैसे कुछ फट गया हो.

मैं सोच रहा था कि अगर सुरेश भैया ने मेरी गांड के छेद को ऐसे तैयार ना किया होता और अभी मेरे मुँह को अपने मोटे से लौड़े से सिल कर ना रखा होता, तो रमेश भैया के लौड़े के घुसने से जो दर्द हुआ होता. उसके कारण तो मैंने चीख चीख कर पूरा मोहल्ला सर पर उठा लिया होता.

पर दोनों भाई कोरी गांड खोलने में फुल एक्सपर्ट थे.

ना तो सुरेश भैया ने मेरी आंखों से बहते आंसुओं की परवाह की और मुझे पर कोई दया ना दिखाते हुए मेरे मुँह से अपना लौड़ा बाहर निकाला … और ना ही रमेश भैया ने कोई दया दिखाई.
उन्होंने बेदर्दी का परिचय देते हुए अपने लौड़े को मेरी गांड में और अन्दर ठेला.

दोनों भाई अपनी अपनी पोजीशन में जम गए थे.
वे इंतजार कर रहे थे कि मेरी गांड का छेद रमेश भैया के लौड़े को अपने अन्दर अच्छे से समायोजित कर ले और साथ ही मेरा शरीर दर्द का अहसास खत्म करके मजे को महसूस करने लगे.

अब मेरे चेहरे के भाव भी बताने लगे थे कि मैं थोड़ा रिलैक्स फील कर रहा था.
मेरी आंखें भी नार्मल पोजीशन में आ गयी थीं.

मैंने देखा कि रमेश भैया ने सुरेश भैया को आंख मार कर कोई इशारा किया और सुरेश भैया ने मेरे मुँह से अपना लौड़ा धीरे धीरे बाहर निकाल लिया.

रमेश भैया अभी भी अपनी पोजीशन में जमे हुए थे.
ना उन्होंने अपना लौड़ा मेरी गांड से एक सूत बाहर निकाला और ना एक सूत और अन्दर ठेला.

अब सुरेश भैया मेरे बगल में आकर उलटे होकर लेट गए.
वे अपने राइट हाथ से मेरे लेफ्ट निप्पल को सहलाने लगे और मेरे राइट निप्पल को अपने मुँह में लेकर प्यार से चूसने लगे.

मुझे फिर से मेरे शरीर में असीम आनन्द की हिलोरें महसूस होने लगीं.

मेरे मुँह से मदभरी सिसकारियां और ‘उह आह.’ की तेज आवाजें आने लगीं.

अब रमेश भैया की बारी थी. उनकी ओर से पलंग चर्रमर्र करने लगा क्योंकि उन्होंने आगे पीछे होना शुरू कर दिया था.
अब वह एडजस्ट हो चुकी मेरी गांड की गुफा में अपने लौड़े को आगे पीछे करने लग गए थे.

मेरी गांड की सुरंग की दीवारों पर उनके तमतमाए हुए लोहे से भी सख्त लौड़े की सरसराहट बहुत अच्छी सी लग रही थी.

ऐसा लग रहा था जैसे कोई सख्त हाथ किसी कोमल त्वचा पर कड़क मालिश कर रहा था.
पर मेरी गांड की सुरंग की दीवारों की इस मीठी मीठी मालिश में पता ही नहीं चला कि कब मेरी गांड, रमेश भैया के मोटे लौड़े की गुलाम हो गयी और कब उनके लौड़े को मेरी गांड में फुल एंट्री मिल गयी.

इस धीमी धीमी रगड़ में रमेश भैया ने एक एक सेंटीमीटर करके शुरू के पहले सिंगल झटके में घुसे लंड को बढ़ा कर पूरा घुसा दिया.
मतलब मेरे सहज होने के बाद मुश्किल से एक मिनट के अन्दर रमेश भैया अपना पूरा लौड़ा मेरी अब तक कुंवारी कोरी पड़ी गांड में घुसेड़ चुके थे.
पूरा लंड पेलने के बाद भैया बहुत आराम से अपने पूरे लंड को अन्दर बाहर करके मेरी गांड पेले जा रहे थे.

शायद सुरेश भैया का लंड अपने बड़े भाई का लिहाज जवाब दे गया था.

सुरेश भईया रमेश भैया से बोले- छेद को अच्छे से खोला मैंने, तैयार किया मैंने और मजे आप लूटे जा रहे हो. मुझे भी तो चोदने दो इस नमकीन गांड को!
‘बस 2 मिनट रुक जा, मेरा माल छूटने ही वाला है.’ रमेश भैया बोले.

‘अरे, तो अन्दर मत छोड़ो ना … पहले ही मेरे थूक और आपके मोटे लौड़े की घसड़ घसड़ ने इसकी गांड का छेद चौड़ा कर दिया है. मुझे क्या खाक मजा आएगा. आप एक काम करो, अपना लौड़ा इसकी गांड से निकालो और इसके मुँह में दे दो. क्यों सूर्य, पियेगा ना रमेश भैया का माल … सोच ले, खालिस माल है. एक ही बार में 10-15 लड़कियों को प्रेग्नेंट कर सकता है. क्या पता तू ही मेरे भतीजे की मां बन जाए!
ये कहते हुए, सुरेश भैया खी खी करके हंस दिए.

फिर रमेश भैया भी मेरी टांगों के बीच में से उठे और मेरे साइड आकर अपने ही भाई के थूक में लिपटे अपने लौड़े को मेरे होंठों पर रगड़ते हुए फुसफुसाते हुए बोले- बोल, बनेगा मेरे बच्चे की मां?

मैंने बिना कुछ कहे अपने होंठ खोल दिए.
यह मेरी ओर से सहमति थी कि मैं उनके लौड़े से निकलने वाला माल पीना चाहता हूँ.

इस पर वह मेरे ऊपर 69 पोजीशन में आए और मेरे होंठों पर अपने लौड़े को रख कर, मुरझाये से मेरे लौड़े को अपने मुँह में भर कर चूसने लगे.
फिर मैं भी उनके लौड़े को मुँह में लेकर किसी चॉकलेट बार की तरह चूसने लगा.

दूसरी ओर सुरेश भैया फिर से थोड़ा थूक लगा कर अब तक सूख चुके अपने लौड़े को काम पर लगा चुके थे.
रमेश भैया की ताबड़तोड़ चुदाई से ढीले पड़े मेरी गांड के छेद पर, अपना लौड़ा टिका कर उसे मेरी सुरंग में फिसलाने को तैयार थे.

जैसे ही रमेश भैया के लौड़े का पिस्टन मेरे मुँह में और मेरा लौड़ा टाइट होकर रमेश भैया के मुँह में आगे पीछे होने लगा, सुरेश भैया ने भी अपनी गाड़ी चला दी.

अब किसी 3 सिलिंडर इंजन की तरह उस बिस्तर पर 3 पिस्टन्स एक रिदम में चल रहे थे.
हम तीनों की फ्रीक्वेंसी इतनी मैच कर रही थी कि क्या ही पूछो.

इस बीच कभी कभी रमेश भैया, सुरेश भैया का लौड़ा थोड़ी देर के लिए बाहर निकलवा कर 69 पोजीशन में ही ऐसे पलट जाते कि अब मैं ऊपर और वह नीचे होते और मेरी गांड सुरेश भैया के लौड़े को बढ़िया एक्सेस देती हुई हवा में होती थी.

सुरेश भैया फिर से अपनी धकम पेल में जुट जाते.

इसी बीच, रमेश भैया ने थोड़ी देर के लिए मेरे मुँह में अपना लौड़ा जड़ तक घुसेड़ दिया और मुझे कस कर जकड़ लिया.
फिर मुझे मेरे हलक में कुछ गर्म गर्म गाढ़ा गाढ़ा रस बहता हुआ महसूस हुआ.
ये रमेश भैया का वही अमृत था जो 10 – 15 लड़कियों को एक साथ प्रेग्नेंट करने में सक्षम था.
वह फीलिंग भी मस्त थी.

फिर जैसे ही रमेश भैया फ्री हुए, उन्होंने मेरे लौड़े को तेजी से घपाघप चूसना शुरू कर दिया.
उन्होंने मेरा माल भी अपने मुँह में छुड़वा लिया और उसे गटागट पी गए.

फिर भी वह मुझे वैसे ही जकड़े रहे, पकड़े रहे क्योंकि दूसरे छोर पर उनके छोटे भाई यानि सुरेश भैया फुल स्पीड पकड़ चुके थे.
रमेश भैया को भी पता था कि सुरेश भैया किसी भी पल झड़ सकते हैं.

सुरेश भैया अचानक मेरे ऊपर लेट कर हांफने लगे.
उनका लौड़ा मेरी गांड में फ़ैल सिकुड़ रहा था, कुलबुला रहा था.

फिर सुरेश भैया ने मेरे ऊपर लेटे लेटे ही अपने अमृत का फव्वारा मेरी गांड में छोड़ दिया.

इस समय रमेश भैया हम दोनों के वजन से दबे हुए थे और मैं दोनों भाइयों की छातियों के बीच जकड़ा हुआ था.

कुछ मिनट बाद हम अलग हो गए. फिर हमने एक साथ मेरे बाथरूम में शॉवर लिया, एक दूसरे को अच्छे से साफ़ किया.

अब मेरे शरीर में कोई गर्मी नहीं थी. बहुत संतुष्टि वाली फील आ रही थी.
हम तीनों मेरे डबल बेड पर ही नंगे ही सो गए. मैं उन दोनों के बीच में सोया था.
ग्रुप गे सेक्स करके हम तीनों शायद इतने संतुष्ट थे कि सीधे सुबह ही जागे.

दिन में मेरे लिए लंच बना कर वे दोनों निकल गए और शाम को वह फिर से घर से खाना लाए.
पर इस बार लस्सी में कोई बूटी नहीं थी.

उस शाम उन्होंने मुझे सेक्स का और ज्ञान दिया.
उन्होंने मुझे चोदना सिखाया और ये भी सिखाया कि बिना झड़े लम्बे समय तक कैसे चोदा जाता है.

इसके लिए रमेश भैया ने सुरेश भैया को बकरा बनाया.
मुझे चोदना सिखाने के लिए रमेश भैया ने मुझसे सुरेश भैया को चुदवाया.

उस रात मैंने सुरेश भैया को 5 बार चोदा. पहली बार तो घुसाते ही मेरा माल निकल गया, दूसरी बार मैं 4 मिनट तक होल्ड कर पाया.
तीसरी बार मैंने रमेश भैया के सिखाये अनुसार, सुरेश भैया को बराबर चोदा और करीब 10 मिनट तक फुल मजे लेकर चोदा.

फिर चौथी और पांचवी बार, मेरे टाइम और बढ़ गया.
सुबह होते होते, सुरेश भैया की गांड का गोदाम बन गया था.

फिर अगली सुबह पापा आ गए. हम तीनों को खुश देख कर वह भी बहुत खुश हुए.
उनके आने के बाद रमेश भैया सुरेश भैया अपने घर चले गए.

उसके बाद, इस तरह पूरी रात के लिए तो हम कभी नहीं मिल पाए. पर फिर भी कभी पहाड़ों पर चले जाते, कभी नदी पर नहाने चले जाते. कभी कुछ और मौके निकाल ही लेते थे.

पर एक बात थी, इतने टाइम में मैंने कभी नहीं देखा कि रमेश भैया और सुरेश भैया ने एक दूसरे को सेक्सुअली छुआ भी हो या किस भी किया हो.
उन दोनों को सिर्फ मेरे साथ ही सेक्स करने में मजा आता था.

लगता है, मैं ही उन दोनों भाइयों की पहली और आखिरी गर्लफ्रेंड था.

आपको मेरी ग्रुप गे सेक्स कहानी में मजा आया होगा, प्लीज मेल लिखें.
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